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14/12/2008

आतंकवाद और आतंकवादी की माँ

आतंकवाद और आतंकवादी की माँ

चाँद सा सुत जन्मा
माँ खुश
गोदी मे लाल की किलकारी
लगी बडी प्यारी
दिख गए सूनी आँखों मे
न जाने कितने ही सपने
बडा होगा तो
सहारा बन जाएगा
उसकी सौतन भूख को भगाएगा
मेरा नाम भी चमकाएगा
पर सौतन थी कि
बदले की आग मे भडकी थी
उसने भी अपनी जिद्द पकडी थी
सौतेली ही सही
मै इसकी माँ कहलाऊँगी
और दुनिया को दिखाऊँगी
इसकी माँ के साथ मेरा नाम भी आएगा
सौतेला ही सही
मेरा सुत भी कहलाएगा
मेरे लिए यह खून पिएगा
दूसरों को मार के जिएगा
माँ का दूध नहीं इसके सर
खून चढ के बोलेगा
खुद रुलेगा दूसरों को रोलेगा
जननी की लाचारी थी
सौतन जो अत्याचारी थी
चाह कर न बचा पाई अपना ही जाया
सौतेली माँ ने ऐसा भरमाया
हाथ मे हथियार थमा दिया
और सौतेले सुत को
आतंकवादी बना दिया
खुद आतंकवाद की माँ बन बैठी
न जाने कितनी ही लाशें
उसके सम्मुख लेटीं
सौतेले सुत ने नाम चमका दिया
स्वंय को आतंकवादी बना दिया
जननी का कर्ज़ ऐसा चुकाया कि
उसकी कोख पर कलंक लगा दिया
सौतेली माँ को जिता दिया
और अपनी माँ को
आतंकवादी की माँ बना दिया

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2 टिप्‍पणियां:

Yusuf Kirmani ने कहा…

सौतेली माँ ने ऐसा भरमाया
हाथ मे हथियार थमा दिया
और सौतेले सुत को
आतंकवादी बना दिया

काफी कुछ कह दिया आपने इस कविता में। और हां, नन्हा मन वाले ईमेल आईडी पर मैंने आपको ईमेल की थी। पता नहीं आप तक ईमेल पहुंची या नहीं। मेरे पास आपका बस यही ईमेल है, दूसरा नहीं।

VisH ने कहा…

aapne ne to kavita ke madhyam se sabkuch badal diya......
wahhhh likhte raho....aapke lakhen se bahut kuch sikhne ko milta hai....


Jay ho magalmay ho....