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24/01/2009

अज्ञात कन्या का मर्म

अज्ञात कन्या का मर्म (राष्ट्रीय कन्या दिवस विशेष)
अज्ञात कन्या का मर्म

भिनभिनाती मखियाँ
कुलबुलाते कीडे
सूँघते कुत्ते
कचरादान के गर्भ मे
कीचड़ से लथपथ
फिर से पनपी
एक नासमझ जिन्दा लाश
छोटे-छोटे हाथों से
मृत्यु देवी को धकेलती
न जाने कहाँ से आया
दुबले-पतले हाथों में इतना बल
कि हो गए इतने सबल
जो रखते है साहस
मौत से भी जूझने का
शायद यह बल
वह अहसास है
माँ के पहले स्पर्श का
वह अहसास है
माँ की उस धड़कन का
जो कोख मे सुनी थी
चीख-चीख कर कहती है
नन्ही सी कोमल काया....
मैं जानती हूँ माँ
मैं पहचानती हूँ
तुम्हारी ममता की गहराई को
तुम्हारे स्नेह को
तुम्हारे उस अनकहे प्यार को
महसूस कर सकती हूँ मैं
भले यह दुनिया कुछ भी कहे
मैं इस काबिल नहीं कि
सब को समझा सकूँ
तुम्हारी वो दर्द भरी आह बता सकूँ
जो निकली थी तेरे सीने की
अपार गहराई से
मुझे कूडादान में सबसे छुप-छुपा कर
अर्पण करते समय
यह तो सदियों से चलता आ रहा सिलसिला है
कभी कुन्ती भी रोई थी
बिल्कुल तुम्हारे ही तरह
मैं जानती हूँ माँ
तुम भी ममतामयी माँ हो
न होती
तो कैसे मिलता मुझे तुम्हारा स्पर्श
तुम तो मुझे कोख मे ही मार देती
नहीं माँ ! तुम मुझे मार न सकी
और आभारी हूँ माँ
जो एक बार तो
नसीब हुआ मुझे तुम्हारा स्पर्श
उसी स्पर्श को ढाल बना कर
मैं जी लूँगी
माथे पर लगे लाँछन का
जहर भी पी लूँगी
तुम्हारे आँचल की
शीतल छाया न सही
तुम्हारे सीने से निकली
ठण्डी आह का तो अहसास है मुझे
धन्य हूँ मै माँ
जो तुमने मुझे इतना सबल बना दिया
आँख खुलने से पहले
दुनियादारी सिखा दिया
इतना क्या कम है माँ
कि तूने मुझे जन्मा
हे जननी!
अवश्य ही तुम्हारी लाचारी रही होगी
नहीं तो कौन चाहेगी
अपनी कोख में नौ माह तक पालना
कुत्तो के लिए भोजन
इसीलिए तो दर्द नहीं सहा तुमने
कि दानवीर बन कर
कुलबुलाते कीड़ों के भोजन का
प्रबन्ध कर सको
नहीं! माँ ऐसी नहीं होती
मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं
मैं ही अभागी
तुम्हारी कोख में न आती
आई थी तो
तुम्हें देखने की चाहत न करती
बस इसी स्वार्थ से
कि माँ का स्नेह मिलेगा
जीती रही, आँसू पीती रही
एक आस लिए मन में...
स्वार्थ न होता
तो गर्भ में ही मर जाती
तुम्हें लाँछन मुक्त कर जाती
किसी का भोजन भी बन जाती
पर यह तो मेरे ही स्वार्थ का परिणाम है
कि बोझ बन गई मैं दुनिया पर
कलंक बन गई तेरे माथे पर
कुत्तों, कीड़ों या चीलों का
भोजन न बन सकी
और बन गई एक अज्ञात कन्या
अज्ञात कन्या
*****************************
कार्टून बनाया- मनु बेतखल्लुस



19 टिप्पणी:
संगीता पुरी said...
राष्ट्रीय बालिका दिवस पर बहुत अच्‍छी कतवता प्रस्‍तुत की है आपने....;आभार....सभी कन्‍याओं को उनके बेहतर भविष्‍य के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं।

January 24, 2009 12:49 PM
Divya Prakash said...
कार्टून बहुत अच्छा लगा मुझे और कविता की ही तेरह बहुत मार्मिक है.....
वास्तव में अभी भी बहुत लोगो की मानसिकता लड़कियों को लेकर,दकियानूसी ही है ..
एक फिल्म आई थी "मात्रभूमि - A Nation without women "
मैं सभी को कहूँगा की एक बार ये फिल्म भी जरुर देखें ....बहुत दिनों तक ये फिल्म आपको परेशान करती रहेगी ...

January 24, 2009 1:17 PM
anuradha srivastav said...
बेहद मार्मिक व संवेदित करती कविता। चित्र भी कविता की तरह ही प्रभावी है।

January 24, 2009 1:28 PM
रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) said...
कविता और कार्टून के सहारे भ्रूण ह्त्या और कन्या पर मार्मिक प्रस्तुतिकरण, लेखिका और चित्रकार दोनों को बधाई, और सिर्फ़ शब्द नही जरुरत एक दृढनिश्चय की और उस पर अमल की. आगे हमें ही तो आना है.
धन्यवाद

January 24, 2009 1:35 PM
चारु said...
आँखों में आँसू ला दिया आपकी कविता ने....
और मनु जी आपके कार्टून ने तो दिल दहला दिया।

January 24, 2009 2:48 PM
manu said...
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कविता वाकई हौलनाक है...रोंगटे खड़े कर देने वाली.....
एक अपील नियंत्रक जी से...की इस तरह के काम के लिए कुछ समय अधिक दिया करें ...क्यूंकि समय की कमी...बिजली की किल्लत के कारण रात रात जागना पड़ता है...और अगर इस काम को किसी वजह से नहीं कर paataa to khud se bahut sharmindaa hotaa.... maaf kijiye translation me dikkat hai

January 24, 2009 3:10 PM
Dilsher Khan said...
बेहतरीन , वाकई, लाजवाब, कमाल कर दिया आपने... बेहद मार्मिक...!
दिलशेर "दिल"

January 24, 2009 5:16 PM
सीमा सचदेव said...
मनु जी आपका चित्र तो किसी की भी आँखों में आंसू ला दे
मुझे नही मालूम था कि मेरी कविता पर आपको चित्र
बनाने का कार्य सौंपा जाएगा वरना मै कविता कुछ दिन पहले ही
भेज देती मैंने कल ही यह कविता भेजी थी और मै समझ
सकती हूँ कि आपके लिए कितना मुश्किल रहा होगा यह
कार्य उस पर भी जो मार्मिक चित्र आपने बनाया उसके लिए
आप काबिले तारीफ़ है आपका बहुत बहुत धन्यवाद .....सीमा सचदेव

January 24, 2009 5:25 PM
आलोक सिंह "साहिल" said...
गजब का मर्म छुपा है,सीमा जी....
बेहतरीन कविता...
मनु भाई हमेशा की ही तरह इसबार भी बेतखल्लुस..
आलोक सिंह "साहिल"

January 24, 2009 6:11 PM
अवनीश एस तिवारी said...
अफ़सोस की बात तो है लेकिन कोशिश से बदल जायेगा
रचना के लिए बधाई

अवनीश

January 24, 2009 6:39 PM
Harkirat Haqeer said...
सीमा जी और मनु जी आपको ढेरों आशीष इतनी सुन्‍दर प्रस्‍तुती के लिए...

January 24, 2009 6:42 PM
सुशील कुमार said...
सीमा सचदेव की कविता“अज्ञात कन्या..” हृ-तंत्र को झंकृत करती हुई संवेदना की गहराई में धँसकर मानव के उस घिनौने कर्म को कायल करती है जहाँ स्त्री-जाति के प्रति घृणा और उपेक्षा का निमर्म भाव वर्तमान हो।कविता में लय और संगति पूर्णत: ‘इनटैक्ट’ है जो कविता को समकालीन कविता का दर्जा देती है।इस कविता की बड़ी विशेषता यह है कि इसकी भाषा की सरलता,भाव की संश्लिष्टता और भावपराणयता कविता को पठनीय बनाती है जो कविता-पाठ के क्रम में पाठक को कविता के अंत तक बाँधे रखती है।

January 25, 2009 5:24 PM
सुशील कुमार छौक्कर said...
बालिका दिवस पर एक अच्छी रचना की प्रस्तुति।

January 25, 2009 6:32 PM
vinay k joshi said...
सीमा जी
मन की गहराई से लिखी गई कविता जो किसी भी संवेदनशील को झकझोरने का माद्दा रखती है ---बधाई
मनुजी
एक चित्र किसी कहानी से अधिक वजन रख सकता है, आपने दर्शाया है --- बधाई
सादर,
विनय के जोशी

January 25, 2009 8:54 PM
rachana said...
सीमा जी
इस कविता का एक एक शब्द बहुत दिनों तक दिल पर दस्तक देता रहेगा .कई बार आप की कविता सोच आंख नम करता रहेगा
उफ़ ये शब्द ये भाव मर्म की सीमा है
सीमा जी बहुत सुंदर लिखा है आप ने
मनु जी आप का चित्र इतना कुछ कहता है की उस पर किताब लिखी जा सकती है .जो जितना चाहे पढ़ ले एसा है
सादर
रचना

January 26, 2009 3:15 AM
Vivek Gupta said...
बेहतरीन

January 26, 2009 6:03 AM
प्रकाश बादल said...
वाह वाह मनु भाई का कार्टून तो अपने आप में एक सटीक और ज़बर्दस्त कविता कह रहा है। भाई मनु! कहाँ से ऐसे ख्याल आजाते हैँ वाह वाह क्या ज़बर्दस्त है। आप एक दिन चमकेंगे। और सब आपकी चमक के आगे फीके होंगे।


कविता भी बहुत अच्छी और सटीक है। कवियत्रि को भी मेरी बधाई।

एक शेर मैं भी बेटियों के कातिलोँ पर ठोंक ही देता हूँ मुझे उम्मीद है कि ये मेरी बददुआ उन सब को लगेगी जिनको मैं चाहता हूँ।


" कोख़ को जो, 'बेटियोँ की कब्र' बना देते हैं।

उन सभी लोगों को हम बददुआ देते हैं।
"

January 26, 2009 11:52 AM
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...
माम्र्स्पर्शी रचना,
सटीक प्रभावी चित्र.
कवयित्री और चित्रकार दोनों को साधुवाद.
कविता में शब्दचित्र.
रेखाचित्र में कविता.

January 27, 2009 7:02 PM
dschauhan said...
उनके प्रति अपना भी कुछ फर्ज़ है!
हम पर भी तो उनका भारी कर्ज़ है!!
इसमे फ़र्ज के कर्ज में भी अपनी ही गर्ज है!
आओ मुमकिन कर लें यह भी कोई मर्ज है!!

January 27, 2009 9:15 PM

23/01/2009

जब तक रहेगा समोसे मे आलू -एक व्यंग्य कविता

जब तक रहेगा समोसे मे आलू

रात को सोते हुए
अजीब सा ख्याल कौंध आया
और मैने ................
मिनी स्करट पहने हीर को रोते हुए पाया
मैने पूछा ! यह अश्रुजल क्यों है तुम्हारी आँखों में?
तुमतो एक हो लाखों में
तुम्हे प्यार तो दुनिया भर का मिला है
तुम को तो प्यार की दुनिया में
अच्छा ख़ासा नाम भी मिला है
अमर हो तुम दोनो सदा के लिए
मरे इक्कठे , जिए इक्कठे जिए
अब तुमको कोई अलग नही कर सकता है
फिर क्यों रोती हो तुम ?
तुम्हारा प्यार कभी नही मर सकता है
हीर बोली! बहन तुम सच्च कहती हो
पर मैं पूछती हूँ तुमसे,
किस दुनिया मे रहती हो ?
मैने जब पूछा था रांझा से.......
तुम्हे मुझसे प्यार है कितना?
बोला था सर उठाकर गर्व से....
समोसे मे आलू की उम्र के जितना
मैने कहा ! हाँ सुना तो है मैने भी
कुछ ऐसा ही गाना
पर मुझे आता नही गुन-गुनाना
उसका भी भाव तो कुछ ऐसा ही था
और उसमें भी आलू और समोसा ही था
हीर झल्ला कर बोली...........
सुना है तो पूछती क्यों हो?
दुखती रग पर हाथ रखती क्यों हो?
मेरी समझ मे कुछ ना आया
और फिर से हिम्मत करके मैने हीर को बुलाया
इस बार हीर को गुस्सा आया
फिर भी उसने मेरी तरफ सर घुमाया
मैने कहा ! आलू और समोसे का गाने मे
केवल शब्दों का सुमेल बनाया
परन्तु मेरी समझ में अभी तक यह नही आया
कि तुम्हारे नेत्रों में अश्रुजल क्यों भर आया?
अब हीर लगी फूट-फूट कर रोने
और आँसू से अपने सुन्दर मुख को धोने
अपने रोने का कारण उसने कुछ यह बताया
बहन आज हमने एक रेस्टोरेंट में समोसा ख़ाया
हलवाई ने समोसा बिना आलू के बनाया
और तब से रांझा मुझे नज़र नहीं आया
कदम की आहट से हमने सर घुमाया
मॉडल के साथ ब्रांडेड जींस पहने
रांझा को खड़ा पाया
अब मुझे भी थोड़ा गुस्सा आया
और रांझा को मैने भी कह सुनाया
प्रेमिका को रुलाते हो
तुम्हे शर्म नही आती
एक को छोड़ कर दूसरी को घुमाते हो
यह बात तुम्हे नही भाती
कैसी शर्म ? रांझा बोला .........
मैं आदमी नही हूँ चालू
मैने कहा था हीर से........
मैं तब तक हूँ तेरा ,
जब तक है समोसे मे आलू
जब आलू के बिना समोसा बन सकता
तो मैं अपनी हीर क्यू नही बदल सकता ?
यह समोसे की नई तकनीक ने कमाल दिखाया
और मुझे अपनी नई हीर से मिलाया
इतने मे बाहर के शोर ने मुझे जगाया
और सामने सच में
ऐसी हीरों और रांझो को पाया
---------------------------
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---------------------------
पूछना है मुझे ऐसे प्यार के परिंदो से
कुछ ऐसे ही सामाजिक दरिंदों से
क्या यही रह गई है भारत कि सभ्यता?
और क्या यही है प्यार कि गाथा ?

************************

21/01/2009

कौन है वो

कौन है वो

वो जो बैठी है चौराहे पर
वो जो ताकती है इधर-उधर
वो जिसकी भूखी है निगाहे
वो जो पी रही पीडा के आँसु
वो जो मिटा रही हवस की भूख
वो जो खुद हरदम भूखी
वो जिसकी मर चुकी सारी चाहते
वो जो जीती है दूसरो की खातिर
वो जिसका कोई मूल्य नही
वो जो अर्धनग्न है ...
शौक से नही मजबूरी से
वो जो देती है अल्ला का वास्ता
वो जिसकी आदत है हाथ फैलाना
वो जो बनाती है हर दिन न्या बहाना
वो जो पेट के लिए पेट दिखाती है
और किसी की
भूख का शिकार हो जाती है
खुद भूखी ही सो जाती है
वो जो सडक किनारे सो जाती है
वो जो बिना बात बतियाती है
वो जो मुँह मे बुदबुदाती है
वो जो भाव हीन है
वो जिसका जीवन रसहीन है
वो जो फटे कपडे से तन ढाँपती है
वो जिससे मृत्यु भी काँपती है
वो जिसने बस मे किया है अपना मन
जो नही कर सकता साधारण जन
वो जिसने सुखा दिया है
अपने आसुँओ का पानी
वो जिसके लिए कोई ऋतु नही सुहानी
सर्दी ,गर्मी,बरसात
सबमे एक सी रहती है
धूप को छाँव और सर्दी को गर्मी कहती है
कौन है वो.............?
कोई माँ ,पत्नी ,बहु या किसी की बेटी
या फिर
पता नही कौन .....?
*************************

20/01/2009

परछाई

परछाई


घूरती हुई क्रूर निगाहे
झपट लेने को लालायित
पसरा केवल स्वार्थ
दुर्विचार,आडम्बर
नही बचा इससे कोई घर
बोई थी प्यार की फसल
मिला नफरत का फल
सच्चाई की जमीन को
रौन्दता झूट का हल
मिठास मे छिपा
जानलेवा जहर
भूखी निगाहो मे लालच का कहर
रह गया केवल अकेलापन
कही भी तो नही अपनापन
यह लम्बा सफर काटना अकेले
तन्ग डगर टेढे-मेढे रास्ते
न जाने चलना है
इनपर किनके वास्ते
इधर-उधर आजु-बाजु
कोई भी तो नही साथ
तन्हाई, सन्नाटा सूनापन
दिन भी लगे काली रात
छाया मन मस्तिष्क पर
घोर अँधकार
मिट चुके सारे विचार
पर अचानक
सन्नाटे को चीरती एक ध्वनि
जैसे बोल उठी हो अवनि
कहाँ हो अकेले.......?
यहाँ तो हर कदम पर मेले
देखो मेरी गोदि मे
और देखो मेरे प्रियतम की छाया
जो बनी रहती है सब पर
नही तो देखो अपना ही साया
जो सुख की शीतलता मे भले ही
नज़र न आए
पर गम की तीखी धूप मे
कभी आगे तो कभी पीछे
हर पल साथ निभाए
नही है केवल तन्हाई
तुम्हारे पास है
तुम्हारी अपनी परछाई

15/01/2009

जीवन एक कैनवस

जीवन एक कैनवस

दिन -रात,सुख-दुख ,खुशी -गम
निरन्तर
भरते रहते अपने रन्ग
बनती -बिगडती
उभरती-मिटती तस्वीरो मे
समय के साथ
परिपक्व होती लकीरो मे
स्याह बालो मे
गहराई आँखो मे
अनुभव से
परिपूर्ण विचारो मे
बदलते
वक़्त के साथ
कभी निखरते
जिसमे
स्माए हो
रन्ग बिरन्गे फूल
कभी
धुँधला जाते
जिस पर
जमी हो हालात की धूल
यही
उभरते -मिटते
चित्रो का स्वरूप
देता है सन्देश
कि
जीवन है एक कैनवस

13/01/2009

माँ (बारह क्षणिकाएँ)

माँ (बारह क्षणिकाएँ)


आजकल माँ
बहुत बतियाती है
जब भी फोन करो
आस-पडोस की भी बाते सुनाती है
२.
न जाने क्यो लगता है
माँ की आँखे नम है
उसे कही न कही
कुछ खो देने का गम है
३.
सुबह सबसे पहले उठ कर
सारा काम निपटाती है
मेरी काम वाली आई कि नही
इसकी चिन्ता लगाती है
४.
कहती है आजकल
पेट खराब है
और मेरी आवाज़ को
हाजमौला बताती है
५.
लगता है अभी आएगी
ले लेगी मुझे गोदि मे
और फिर प्यार से
मेरे सर मे उन्गलियाँ चलाएगी
६.
कई बार
चुप सी रहती है
मुँह से कुछ नही कहती
पर आँखे बहुत कुछ बोलती है
७.
हर रोज
मुझे फोन लगाती है
खाना खाया कि नही
याद दिलाती है
८.
अपनी पीडा के आँसु
पलको मे छुपा कर
मेरी पीडा मुझसे उगलवाती है
९.
खुद तो सारी उम्र
न जाने कितना ही त्याग किया
मेरे छोटे से समझौते को
बलिदान बताती है
१०.
आजकल माँ
सपनो मे आकर
मुझे लोरी सुनाती है
हर जख्म को सहलाती है
११
सबसे प्यारी
सबसे अलग
ममता की मूर्त्त
माँ तुम ऐसी क्यो हो ?
१२.
माँ आजकल
तुम बहुत याद आती हो
जी चाहता है अभी पहुँच जाऊँ
इतना स्नेह जताती क्यो हो ?

*************************

12/01/2009

मृग-तृष्णा

मृग-तृष्णा

एक दिन
पडी थी
माँ की कोख मे
अँधेरे मे
सिमटी सोई
चाह कर भी कभी न रोई
एक आशा
थी मन मे
कि आगे उजाला है जीवन मे
एक दिन
मिटेगा तम काला
होगा जीवन मे उजाला
मिल गई
एक दिन मंजिल
धड़का उसका भी दुनिया मे दिल
फिर हुआ
दुनिया से सामना
पडा फिर से स्वयं को थामना
तरसी
स्वादिष्ट खाने को भी
मर्जी से
इधर-उधर जाने को भी
मिला
पीने को केवल दूध
मिटाई
उसी से अपनी भूख
सोचा ,
एक दिन
वो भी दाँत दिखाएगी
और
मर्जी से खाएगी
जहाँ चाहेगी
वहीं पर जाएगी
दाँत भी आए
और पैरो पर भी हुई खडी
पर
यह दुनिया
चाबुक लेकर बढी
लडकी हो
तो समझो अपनी सीमाएँ
नही
खुली है
तुम्हारे लिए सब राहे
फिर भी
बढती गई आगे
यह सोचकर
कि भविष्य मे
रहेगी स्वयं को खोज कर
आगे भी बढी
सीढी पे सीढी भी चढी
पर
लडकी पे ही
नही होता किसी को विश्वास
पत्नी बनकर
लेगी सुख की साँस
एक दिन
बन भी गई पत्नी
किसी के हाथ
सौप दी जिन्दगी अपनी
पर
पत्नी बनकर भी
सुख तो नही पाया
जिम्मेदारियो के
बोझ ने पहरा लगाया
फिर भी
मन मे यही आया
माँ बनकर
पायेगी सम्मान
और
पूरे होंगें
उसके भी अरमान
माँ बनी
और खुद को भूली
अपनी
हर इच्छा की
दे ही दी बलि
पाली
बस एक ही
चाहत मन मे
कि बच्चे
सुख देंगें जीवन मे
बढती गई
आगे ही आगे
वक़्त
और हालात
भी साथ ही भागे
सबने
चुन लिए
अपने-अपने रास्ते
वे भी
छोड गए साथ
स्वयं को छोडा जिनके वास्ते
और अब
आ गया वह पड़ाव
जब
फिर से हुआ
स्वयं से लगाव
पूरी जिन्दगी
उम्मीद के सहारे
आगे ही आगे रही चलती
स्वयं को
खोजने की चिन्गारी
अन्दर ही अन्दर रही जलती
भागती रही
फिर भी रही प्यासी
वक़्त ने
बना दिया
हालात की दासी
मीदो से
कभी न मिली राहत
और न ही
पूरी हुई कभी चाहत
यही चाहत
मन मे पाले
इक दिन दुनिया छूटी
केवल एक
मृग-तृष्णा ने
सारी ही जिन्दगी लूटी

**************************
हिन्दयुग्म में प्रकाशित

सीमा सचदेव

09/01/2009

कसम से .....वो दर्द हम....

कसम से .....वो दर्द हम....

दर्द मे पनपते है गीत ऐसा ही कुछ लोग कहते है
सीने मे कुछ दर्द कसम से जिन्दा दफन रहते है


छोटे से तयखाने मे उमडते है विशाल सागर
कातिल लहरो मे कसम से उसकी कफन बहते है


कहाँ मिलता है ऐसी पीडा को शब्दो का सम्बल
हर पल जिसके कसम से किले बनते औ ढहते है



ना वक़्त ना हालात लगा सकते है उस पर मरहम
वो दिल सीने मे कसम से कितना दर्द सहते है


सच्च कहते है दर्द की कोई सीमा नही होती
वो दर्द हम कसम से सीने मे समेटे रहते है



*************************************************************

06/01/2009

कुत्तों की सभा- एक हास्य-व्यंग्य कविता

कुत्तो की सभा
कुत्तो ने इक सभा बुलाई
सबने अपनी समस्या सुनाई
सुन रहा कुत्तो का सरदार
हर समस्या पे होगा विचार
समस्या अपनी लिख कर दे दो
कोई एक फिर उसको पढ दो
हर समस्या का हल ढूढेन्गे
जो भी होगा सब करेन्गे
आई समस्याएँ कुछ ऐसी
चलते फिरते मानव जैसी


समस्या आई नम्बर वन
भौक के बीत गया यह जीवन
भौन्कने मे थे बडी मिसाल
पर नेता ने समझ ली चाल
भौन्कता है वो हमसे ज्यादा
हमे फेल करने का इरादा



समस्या नम्बर आई दो
सुनाई कुत्ते ने रो-रो
अब तो कोई करो इन्साफ
करदो मेरी गलती माफ
मैने इक हड्डी थी उठाई
गली मे लावारिस थी पाई
उठा कर क्या गलती की मैने
अब तक मुझको मिलते ताने
पानी मे दिख गई परछाई
मैने समझा मेरा भाई
भाई समझ कर मै था भौन्का
लोगो को बस मिल गया मौका
लालची कहकर लगे चिढाने
बच्चो को शिक्षा के बहाने
सबने मुझको लालची कह दिया
मैने मुकदमा दायर कर दिया
तब तो था मुझमे भी जोश
पर अब उड गए मेरे होश
नही और मै लड सकता हूँ
न समझौता कर सकता हूँ
लालची सुनकर पक गया हूँ
अब मै सचमुच थक गया हूँ
दिख गई मेरी एक ही हड्डी
पर खाते जो रोज सब्सिडी
उनको कोई लालची नही कहता
उनका चेहरा कभी न दिखता
कहते-कहते भर आया मन
कुत्ते के गिर गए अश्रु कण


पानी पिलाकर चुप कराया
अब तीसरी समस्या को लाया
उठते मेरी दुम पे स्वाल
कैसे है लोगो के ख्याल
बोले कभी सीधी नही होती
बारह साल दबाओ धरती
जो मेरी दुम सीधी होगी
तो क्या जगह को साफ करेगी
बताओ फिर यह कैसे हिलेगी ?
हिलाए बिना न रोटी मिलेगी
मेरी दुम के पीछे पडे है
किस्से करते बडे बडे है
पर नही सीधे होते आप
टेढे हर दम करते पाप


अब सुनो समस्या फोर्
कहते मुझको पकडो चोर
बताओ मै किस-किस को पकडूँ
किस-किस को दाँतो मे जकडूँ
मुझे तो दिखते सारे ही चोर
कहाँ-कहाँ मचाऊँ मै शोर



समस्या नम्बर आई फाईव
देखो समचार यह लाईव
हुई है नई कम्पनी लाँच
बाँध के रखे है कुत्ते पाँच
कहते है कुत्ते है वफादार
बाँधो इन्हे बिल्डिन्ग के द्वार
अन्दर बैठे धोखेबाज
कैसे -कैसे है जालसाज
भौन्के जब उन दगाबाज पे
तो बन जाए उनकी जान पे

अब आई है समस्या सिक्स
कैसे हो जाएँ सबमे मिक्स
--------------------------


--------------------------
बस करो ! सरदार चिल्लाया
गुस्से मे फरमान सुनाया
पीले से मै हो गया काला
लगा न तेरे मुँह पे ताला

झट से अपना बुलाया सहायक
यह सारे तो है नालायक
तुम एक सॉफ्टवेयर बनवाओ
सारा डाटा फीड कराओ
फिर हम उसमे सर्च करेन्गे
समस्याओ का हल ढूँढन्गे
मेरे पास कभी न आना
पर जब चाहो मेल लगाना
मिनटो मे हल होगी समस्या
नही करोगे कोई तपस्या
इक सी.सी.टी.वी. लगवाओ
मेरे कैबिन मे फिट कराओ
नज़र मै अब हर पल रखुँगा
सबसे ही इन्साफ करूँगा
जो हुआ ! उसको जाने दो
क्षमा अब नादानो को करदो
पर आगे से रहे ध्यान
कुत्तो का न हो अपमान
ऐसी कोई गलती न करना
मेरे सम्मुख कभी न रोना




***********************************
इन दोनो तस्वीरों को देख कर ही यह कविता लिखी थी मुझे याद नहीं मैने यह चित्र कहां देखे और सेव कर लिए किसी को कोई आपत्ति हो तो लिखें ,यह चित्र हटा दिए जाएंगे धन्यवाद

05/01/2009

जब चेहरे से नकाब हटाया मैने

जब चेहरे से नकाब हटाया मैने

कहते हैं चेहरा दिल की जुबान होता है
दिख जाता है चेहरे पर
जो दिल मे तूफान होता है
एक तूफान के बवंडर को छुपा लिया मैने
अपने चेहरे पे एक नया चेहरा लगा लिया मैने
फिर तूफान पे तूफान आए
मैने भी चेहरे पे चेहरे लगाए
दिखने मे खूबसूरत थे
किसी की खातिर मेरी जरूरत थे
बाहरी खूबसूरती के सम्मुख
असली खूबसूरती बेमानी थी
किसी ने भी वो खूबसूरती
नही पहचानी थी
मै घिरती गई
चेहरों के चक्रवात मे
जो दिखाए थे मैने
किसी को सौगात मे
पर भूला नहीं मुझे
अपना असली रूप
जो सबके लिए खूबसूरत थे
वही चेहरे मुझे लगते थे कुरूप
पर क्या करती मजबूरी थी
चेहरे पे मुस्कान जो जरूरी थी
जिनको हालात की खातिर ओढा था मैने
जिनके कारण वास्तविक्ता को छोडा था मैने
जिनको मैने अपनी शक्ति बनाया था
अपनो की मुस्कान हेतु जिनको अपनाया था
वही चेहरे बन बैठे मेरी कमजोरी
और दिखाने लगे सीना जोरी
हर पल मेरे सम्मुख आते
बात-बात पर
मेरी मजबूरी का अहसास कराते
रह जाती मै आंसू पीकर
क्या करना इन चेहरों संग जीकर
डरती थी , चेहरे हटाऊंगी
तो किसी अपने को ही रुलाऊंगी
अपनों की नम आँखें
नहीं देख पाऊंगी
पर आज सहनशीलता छूट गई
चेहरों की दीवार से
एक ईंट टूट गई
हृदय मे एक झरोखा बन आया
मैने एक नकाब हटाया
जो पर्दे मे कैद थीं
वो आँखें खोल दी
मानस पटल पर दबी हुई
कुछ बातें बोल दीं
थोडा ही सही
पर अजीब सा सुकून पाया मैने
जब एक चेहरे से नकाब हटाया मैने

02/01/2009

माँ

माँ





नि:शब्द है

वो सुकून
जो मिलता है
माँ की गोदि मे
सर रख कर सोने मे

वो अश्रु
जो बहते है
माँ के सीने से
चिपक कर रोने मे

वो भाव
जो बह जाते है अपने ही आप

वो शान्ति
जब होता है ममता से मिलाप

वो सुख
जो हर लेता है
सारी पीडा और उलझन

वो आनन्द
जिसमे स्वच्छ
हो जाता है मन


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माँ

रास्तो की दूरियाँ
फिर भी तुम हरदम पास

जब भी
मै कभी हुई उदास

न जाने कैसे?
समझे तुमने मेरे जजबात

करवाया
हर पल अपना अहसास

और
याद हर वो बात दिलाई

जब
मुझे दी थी घर से विदाई

तेरा
हर शब्द गूँजता है
कानो मे सन्गीत बनकर

जब हुई
जरा सी भी दुविधा
दिया साथ तुमने मीत बनकर

दुनिया
तो बहुत देखी
पर तुम जैसा कोई न देखा

तुम
माँ हो मेरी
कितनी अच्छी मेरी भाग्य-रेखा

पर
तरस गई हूँ


तेरी
उँगलिओ के स्पर्श को
जो चलती थी मेरे बालो मे

तेरा
वो चुम्बन
जो अकसर करती थी
तुम मेरे गालो पे

वो
स्वादिष्ट पकवान
जिसका स्वाद
नही पहचाना मैने इतने सालो मे

वो मीठी सी झिडकी
वो प्यारी सी लोरी
वो रूठना - मनाना
और कभी - कभी
तेरा सजा सुनाना
वो चेहरे पे झूठा गुस्सा
वो दूध का गिलास
जो लेकर आती तुम मेरे पास

मैने पिया कभी आँखे बन्द कर
कभी गिराया तेरी आँखे चुराकर

आज कोई नही पूछता ऐसे
???????????????????
तुम मुझे कभी प्यार से
कभी डाँट कर खिलाती थी जैसे


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