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23/01/2009

जब तक रहेगा समोसे मे आलू -एक व्यंग्य कविता

जब तक रहेगा समोसे मे आलू

रात को सोते हुए
अजीब सा ख्याल कौंध आया
और मैने ................
मिनी स्करट पहने हीर को रोते हुए पाया
मैने पूछा ! यह अश्रुजल क्यों है तुम्हारी आँखों में?
तुमतो एक हो लाखों में
तुम्हे प्यार तो दुनिया भर का मिला है
तुम को तो प्यार की दुनिया में
अच्छा ख़ासा नाम भी मिला है
अमर हो तुम दोनो सदा के लिए
मरे इक्कठे , जिए इक्कठे जिए
अब तुमको कोई अलग नही कर सकता है
फिर क्यों रोती हो तुम ?
तुम्हारा प्यार कभी नही मर सकता है
हीर बोली! बहन तुम सच्च कहती हो
पर मैं पूछती हूँ तुमसे,
किस दुनिया मे रहती हो ?
मैने जब पूछा था रांझा से.......
तुम्हे मुझसे प्यार है कितना?
बोला था सर उठाकर गर्व से....
समोसे मे आलू की उम्र के जितना
मैने कहा ! हाँ सुना तो है मैने भी
कुछ ऐसा ही गाना
पर मुझे आता नही गुन-गुनाना
उसका भी भाव तो कुछ ऐसा ही था
और उसमें भी आलू और समोसा ही था
हीर झल्ला कर बोली...........
सुना है तो पूछती क्यों हो?
दुखती रग पर हाथ रखती क्यों हो?
मेरी समझ मे कुछ ना आया
और फिर से हिम्मत करके मैने हीर को बुलाया
इस बार हीर को गुस्सा आया
फिर भी उसने मेरी तरफ सर घुमाया
मैने कहा ! आलू और समोसे का गाने मे
केवल शब्दों का सुमेल बनाया
परन्तु मेरी समझ में अभी तक यह नही आया
कि तुम्हारे नेत्रों में अश्रुजल क्यों भर आया?
अब हीर लगी फूट-फूट कर रोने
और आँसू से अपने सुन्दर मुख को धोने
अपने रोने का कारण उसने कुछ यह बताया
बहन आज हमने एक रेस्टोरेंट में समोसा ख़ाया
हलवाई ने समोसा बिना आलू के बनाया
और तब से रांझा मुझे नज़र नहीं आया
कदम की आहट से हमने सर घुमाया
मॉडल के साथ ब्रांडेड जींस पहने
रांझा को खड़ा पाया
अब मुझे भी थोड़ा गुस्सा आया
और रांझा को मैने भी कह सुनाया
प्रेमिका को रुलाते हो
तुम्हे शर्म नही आती
एक को छोड़ कर दूसरी को घुमाते हो
यह बात तुम्हे नही भाती
कैसी शर्म ? रांझा बोला .........
मैं आदमी नही हूँ चालू
मैने कहा था हीर से........
मैं तब तक हूँ तेरा ,
जब तक है समोसे मे आलू
जब आलू के बिना समोसा बन सकता
तो मैं अपनी हीर क्यू नही बदल सकता ?
यह समोसे की नई तकनीक ने कमाल दिखाया
और मुझे अपनी नई हीर से मिलाया
इतने मे बाहर के शोर ने मुझे जगाया
और सामने सच में
ऐसी हीरों और रांझो को पाया
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पूछना है मुझे ऐसे प्यार के परिंदो से
कुछ ऐसे ही सामाजिक दरिंदों से
क्या यही रह गई है भारत कि सभ्यता?
और क्या यही है प्यार कि गाथा ?

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1 टिप्पणी:

मनुज मेहता ने कहा…

वाह बहुत खूब लिखा है आपने, सही व्यंग कसा है हमारी बदलती सभ्यता पर.
बहुत खूब.
मनुज मेहता