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01/02/2010

एक नागिन की दास्तां.....

घने जंगल में गहरे तरु की छाया में
दुखियारी एक नागिन नें
कुण्डली मारी
अपने ही जायों को फ़ंसाया
अनमने मन से खाया और
कोख से निकाल पेट में पाया
खाते-खाते समझाया
अरे क्यों आए दुनिया में
दुनियादारी निभाने
खुद शिकार बनने या बनाने
नहीं जानते थे तुम
हर कदम पर कांटे चुभेंगे
तुम डरोगे या
तुमसे लोग डरेंगे
न कोई तुम्हें अपनाएगा
न प्यार से गले लगाएगा
अपनी ही मां का
निवाला बनोगे
बस कोख में ही
सुरक्षित रहोगे
देख चुकी हूं मै
अपनी मां से आजाद होकर
हर पल गुजारा रोकर
मां की कुण्डली से
निकल भागी थी मैं
सोई नहीं जागी थी मैं
जन्म लेते ही
भाग निकली थी मां से आगे
आंख बचाकर छुप-छुपाकर
ठोकरें खाते , बचते-बचाते
सीख ली दुनियादारी
सबकी नफ़रत को पीती रही
जैसे तैसे जीती रही
उसी नफ़रत नें मेरे अंदर
जहर से घर बना लिया
देखते ही देखते मेरे जहर का
जादु छा गया
जिससे डरी
उसी को डराना आ गया
मेरे हाथ ज्यों कोई
खजाना आ गया
बेफ़िक्र बेप्रवाह
कहर बरपाती रही
खुद को मिली नफ़रत का
हिसाब चुकाती रही
फ़िर कहर की आंधी आ गई
मै मां बन गई
उमडने लगा मुझमें
ममता का सागर
पर सोचा तुम्हें जन्मुंगी अगर
तो मां की ही भूमिका निभाऊंगी
अपने जायों को खाऊंगी
तब न समझी थी मैं
अपनी मां की समझदारी
और निकल पडी थी
निभाने दुनियादारी
आज समझती हूं
इसलिए वही करती हूं
जो मां ने किया
अगर तुममें से कोई भी जिया
तो वही इतिहास दोहराएगा
मुझसा होकर रह जाएगा
नही , मैं नहीं होने दूंगी
कडवा सत्य तुम्हें
न सहने दूंगी
दुनिया में आकर भी
क्या पाओगे
मेरे पेट में जाओगे
तो निवाला बन जाओगे
इतने में
एक सपोलिया कूदा
मां के चंगुल से
आजाद हो गया
देखती रह गई नागिन
वह आंखों से ओझल हो गया