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06/08/2010

जब पुरुष नें कहा तो कमाल हो गयी , नारी नें कहा तो वो छिनाल हो गयी..........?

बातों से निकली बात बात बेगानी हो गयी


दबी थी जो मस्तक में , अब कहानी हो गयी

अनभव को जीकर छोड़ दो

हर गम से नाता तोड़ दो

बोला जो एक शब्द भी

तो नादानी हो गयी

तुम सहती हो बस सहती रहो

कुछ कहना हो खुद से कहती रहो

कह दी जो मन की बात

तो बदजुबानी हो गयी

न पार करो अपनी सीमा

मुश्किल हो जाएगा जीना

लांघा जो एक कदम तो

इज्जत पानी हो गयी

नारी का घूंघट उतरा

तो धमाल हो गयी

कह दी जो मन की बात

तो वो छिनाल हो गयी

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जो कहना हो खुलकर बोलो

जब चाहे जहां भी जो खोलो

कह दी जो अपनी बात

तो सोच विशाल हो गयी

जब पुरुष नें कह दी बात

तो बात कमाल हो गयी ,

जब नारी उसी पे बोली

तो वो छिनाल हो गयी ..........



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3 टिप्‍पणियां:

JHAROKHA ने कहा…

सीमा जी,बहुत कड़वा यथार्थ आपने अपनी इस कविता में लिखा है----पर ये साहित्य के मठाधीश लोग क्या इसे हजम कर पायेंगे?----वैसे कविता आपकी बहुत बढ़िया लगी।

comment ने कहा…

bahut achhi kavita hai, purush ki yahi soch aurat ko majbut bana rahi hai, waqt badlega soch badlegi. thanx

manu ने कहा…

छिनाल वाली दूसरी पोस्टों पर हम पहले भी कुछ कमेंट्स दे चुके हैं...
ऐसे घटिया बयान... सच में शर्म की बात है ...

हम तो कहते हैं की इसके खिलाफ लिखने कि बजाय...कहीं मिल जाएँ ये महोदय..
तो भिगो भिगो कर जूतियाँ मारनी चाहिए...