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02/02/2009

झोंपड़ी में सूर्य-देवता

झोंपड़ी में सूर्य-देवता

पुल के नीचे
सड़क के बाजु में
तीलो की झोंपड़ी के अंदर
खेलते.............
दो बूढ़े बच्चे
एक नग्न और
दूजा अर्ध-नग्न
दीन-दुनिया से बेख़बर
ललचाई नज़रों से
देखते.........
फल वाले को
आने-जाने वाले को
हाथ फैलाते.....
कुछ भी पाने को
फल,कपड़े,जूठन,खाना
कुछ भी.........
सरकारी नल उनका
गुस्लखाना
और रेलवे -लाइन.....पाखाना
चेहरे पर उनके केवल अभाव
सर्दी-गर्मी का उन पर
नहीँ कोई प्रभाव
अकेले हैं बिल्कुल
कुछ भी तो नहीँ
उनके अपने पास
नहीँ करते वे किसी से
हस्स कर बात
और झोंपड़ी से
झाँकता सूर्य देवता
मानो दिला रहा हो
अहसास........
कोई हो न हो
लेकिन
मैं तो हूँ
और हमेशा रहूँगा
तुम्हारे साथ
तब तक............
जब तक है
तुम्हारा जीवन
यह झोंपड़ी
और ग़रीबी का नंगा नाच........

**********************************

5 टिप्‍पणियां:

विनय ने कहा…

हृदयस्पर्शी रचना!

चाँद, बादल और शाम

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत मार्मिक रचना है।अभावों मे फँसे आदमी का बौत सुन्दर चित्रण किया है।

रंजना ने कहा…

वाह ! दीनता का हृदयस्पर्शी,मार्मिक, सटीक अति सुंदर चित्रण किया है आपने.....
बहुत ही सुंदर इस रचना हेतु साधुवाद.

अनिल कान्त : ने कहा…

मार्मिक और सच्चायी को बयाँ करती रचना

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

'और झोंपड़ी से
झाँकता सूर्य देवता
मानो दिला रहा हो
अहसास........
कोई हो न हो
लेकिन
मैं तो हूँ
और हमेशा रहूँगा
तुम्हारे साथ'

atukaant kavitao me apne bhavo ko chand panktiyo me vayakt kar dena kathin hota he..aapne bakhoobi ek maanviy sachchai ko ukera he..
achchi lagi kavita