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06/04/2010

मैं और तन्हाई - भाग २

मैं और तन्हाई - भाग १

काला अंधियारा सन्नाटा
इक आहट नें उसको काटा
न जाने कहां से आई थी
इक धुंधली सी परछाई थी
बोली मैं साथ निभाऊंगी
तुम्हें छोड कभी न जाऊंगी
मैं चिल्लाई और झल्लाई
पर ढीठ थी कितनी परछाई
मैं रोती रही वो हंसती रही
हंस-हंस कर मुझको डसती रही
छलनी कर गई मेरा सीना
दूभर कर गई मेरा जीना
नहीं पास तू मेरे रह सकती
किसी एक को मैं दूंगी मुक्ति
वो खिल-खिल हंस दी सुन के बात
सूनेपन में देती हूं साथ
तभी तो मैं पास तेरे आई
और नाम है मेरा तन्हाई

क्रमश:

8 टिप्‍पणियां:

सौरभ गुप्ता ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा है. दिल का दर्द सा सामने आ जाता है. सचमुच देखा जाए तो हम सभी तनहा ही हैं. लिखती रहिये.

Shekhar kumawat ने कहा…

तभी तो मैं पास तेरे आई
और नाम है मेरा तन्हाई

BEHAD SUNDAR

BAHUT ACHA LAGA PAD KAR AAP

SHEKHAR KUMAWAT

http://kavyawani.blogspot.com/

Dhiraj Shah ने कहा…

आप ने कम शब्दो मे बहुत कुछ कह दिया
सुन्दर रचना।
आभार।

kshama ने कहा…

मैं रोती रही वो हंसती रही
हंस-हंस कर मुझको डसती रही
छलनी कर गई मेरा सीना
दूभर कर गई मेरा जीना
नहीं पास तू मेरे रह सकती
किसी एक को मैं दूंगी मुक्ति
वो खिल-खिल हंस दी सुन के बात
सूनेपन में देती हूं साथ
तभी तो मैं पास तेरे आई
और नाम है मेरा तन्हाई
Gazab ki panktiyan hain sabhi!

संजय भास्कर ने कहा…

आप ने कम शब्दो मे बहुत कुछ कह दिया

Suman ने कहा…

nice

JHAROKHA ने कहा…

bahut sundar bhaav aur badhiyaa prastuti.
Poonam

Krishna Kumar Mishra ने कहा…

सीमा जी बहुत ही मार्मिक लेखन है आप का!