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30 मई 2022

पहचान और अनुभव

 मैं पहचान हूँ,

पहचान हूँ तुम्हारी,

तुम्हारे संस्कारों की,

तुम्हारी सभ्यता की |

तुम्हारे पहनावे की,

तुम्हारी भाषा की |

तुम्हारे विश्वास की,

तुम्हारी आस्था की |

तुम्हारे घर की,

तुम्हारी बाहर की |

तुम्हारे आराध्य की,

तुम्हारी आराधना की |

तुम्हारे अस्तित्त्व की,

तुम्हारी कल्पना की |

तुम्हारे विचार की,

तुम्हारी भावना की |

तुम्हारे सृजन की,

तुम्हारी वाणी की |

तुम्हारे भविष्य की,

तुम्हारी आज की |

तुम्हारे समाज की |

तुम्हारा बीता हुआ कल भी हूँ मैं,

और आने वाला पल भी हूँ मैं |

मैं ही तुम्हारा अस्तित्त्व हूँ ,

और मैं ही व्यक्तित्त्व भी हूँ |

मैं तुम्हारा व्यवहार भी हूँ,

और तुममे समाया सभ्याचार भी हूँ |

तुम्हारा वजूद भी मैं,

और तिरस्कार भी मैं|

मैं तुम्हारे आत्म-विश्वास में,

मृगतृष्णा की प्यास में |

मैं तुम्हारे भीतर के प्रकाश में भी,

और ज़िंदा ही बन चुकी लाश में भी |

तुम्हारे भीतर कीअसीम गहराई हूँ मैं,

रोम-रोम मे समाई हूँ मैं |

मैं राम हूँ और

रावण भी मैं ही हूँ |

तपती दोपहरी हूँ और

सावन भी मैं ही हूँ |

मैं कृष्ण की बाँसुरी हूँ,

राम का धनुष-बाण हूँ |

मैं गृहस्थी हूँ और ,

मैं ही निर्वाण हूँ |

मैं कोमल सा भाव हूँ ,

कटु वचनों का प्रहार भी हूँ |

मैं मन की शक्ति हूँ,

तो तुम्हारी भक्ति भी हूँ|

मैं सीता की सहनशीलता हूँ,

सूर्पणखा की मलिनता भी हूँ |

मैं यशोदा का दुलार हूँ,

तो कैकेयी का संस्कार भी हूँ |

मैं भरत सा भाई हूँ,

महाभारत की लड़ाई भी हूँ |

मैं केवल कन्स हूँ ,

मनु का वंश भी हूँ |

मैं मीरा की वाणी हूँ ,

मैं झाँसी की रानी भी हूँ |

मैं आशा की किरण हूँ |

तो सोने का हिरण भी हूँ|

मैं सुनहरी प्रभात हूँ,

तो किसी का आघात भी हूँ |

मैं ज़िंदा हूँ ,तो पूराआसमान हूँ |

नहीं तो बस एक  निशान हूँ|

मैं कुदरत का दिया वरदान हूँ |

मुझे पहचानो,

मैं, तुम्हारी ही पहचान हूँ |


अनुभव

 

मैं तुम्हें अनुभव से मिलवाऊंगी ,

अभ्यास से परिचय करवाऊंगी |

तुम्हें भट्ठी में तपाऊँगी और

निखारकर खरा सोना बनाऊंगी |

तुम्हें मुश्किलें भी दूँगी और

रास्ता भी बताऊँगी |

तुम्हें निराशा भी होगी, पर

पर जीवन पाठ भी पढ़ाऊंगी |

अनुभव तुम्हें डगमगाने नहीं देगा |

तुम्हारी ताक़त बन जाएगा |

अनजाने मे ही सही पर,

सीख दे जाएगा |

अनुभव तुम्हें हर मोड़ पर,

सही पथ दिखाएगा |

तुम्हारी पहचान को ,

भीतर से बाहर लाएगा |

अनुभव वह रहस्य जो

साया बन सदा साथ निभाएगा

और अंधकार मे,

प्रकाश बन जाएगा |

अनुभव जब रोशनी बन,

अंतर्मन में बस जाता है |

तो भीतर किसी कोने में,

ज्ञान का दीप जलाता है |

वो ज्ञान जो जीवन का सार है |

वो ज्ञान जो अपरंपार है |

वो ज्ञान जो, ब्रह्मांड मे समाया है,

अनुभव उसी का साया है |

अनुभव अदृश्य शक्ति है |

अनुभव अज्ञानता से विरक्ति है |

3 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (01-06-2022) को चर्चा मंच      "जीवन जीने की कला"  (चर्चा अंक-4448)     पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'    
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Anuradha chauhan ने कहा…

बेहतरीन प्रस्तुति।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

विचारणीय प्रस्तुति