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11-05-2012

छुअन


छुअन
माँ बार-बार देखती थी छूकर
जब भी कभी जरा सा गर्म होता
मेरा माथा
चिढ जाती थी मै माँ की
ऐसी हरकत पर
गुस्सा भी करती
पर माँ
टिकती ही न थी
बार-बार छूने से
गुस्से और चिड-चिडाहट की
प्रवाह न करती
तब तक न हटती
जब तक मेरे मस्तक को
ठण्डक न पहुँच जाती
न जाने बार-बार छुअन से
क्या तस्सली मिलती उसे
उस छुअन का तब
कोई मूल्य न था
और
उस अमूल्य छुअन को
महसूस करती हूँ अब
जब तन क्या मन भी जलता है
मिलता है केवल
व्यवहारिक शब्दोँ का सम्बल
बहुत कुछ दिलो-दिमाग को
छू जाता है
महसूस होती है अब भी
कोई छुअन
जो देती है केवल चुभन
और भर जाती है
अन्तर्मन तक टीस
छेड जाती है आत्मा के सब तार
और वो कम्पन
जला जाता है सब कुछ
बिजली के झटके की भान्ति
अन्दर ही अन्दर
किसी को बाहर
खबर तक नही होती
तभी माँ की वो बचपन की छुअन
पहुँचा जाती है ठण्डक
और करवा देती है
जिम्मेदारियोँ का अहसास
कि आज जरूरत है किसी को
मेरी छुअन की

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04-05-2011

लादेन तुम…………?




लादेन

अगर तुम ज़िंदा होते

तो आज आतंकवाद के आंसू

यूं ही जार-जार न रोते




न आतंकी

तुम्हारी समाधि का

सिन्धु की अपार गहराई में

डुबकी लगाकर ठिकाना ढूँढते



तुम्हारे कितने

दत्तक पुत्र तरस गए हैं

तुम्हारी एक ही झलक पाने को

क्या मुंह दिखाएँ जमाने को……?



vo दत्तक पुत्र

जिनको तुमने पाला पोसा

आतंकवाद की छाँव में

बाँध दी बेड़ियाँ जेहाद की पाँव में



जिनको तुमनें

औलाद सम दिया संरक्षण

बदले और नफ़रत की आग में

फूट पड़े उनके अश्रु तेरे विराग में



लादेन

तुम्हीं तो थे उनका सहारा

क्यों कर गए तुम उनसे किनारा

भरी दुनिया में क्यों बनाया उन्हें बेचारा



तुमनें अपनी

आख़िरी झलक तक न दिखाई

रात के स्याह अँधेरे में गुपचुप

ले ली क्यों अंतिम विदाई ….?



तुम्हारी

एक झलक को

पूरी दुनिया तरसती थी

तुम्हारी जान इतनी तो न सस्ती थी



तुमने जीवन भर

अनगिनत जुल्म किए

जाते-जाते एक भला कर जाते

मरना ही था तो

किसी को अरबपति बना

आराम से मर जाते



हाय रे लादेन

तुम क्यों न आए मेरे सामने ?

देखे थे मैनें भी कितने सपने

कि कभी हमारी मुलाक़ात हो जाएगी

फिर मुझ पर इनामों की बरसात हो जाएगी

मेरा दुनिया में नाम हो जाएगा

तुम्हारा तो कल्याण हो ही जाएगा


लादेन तुम सच में मुझे मिल जाते

तो तुम्हारा क्या बिगड़ जाता ?

हाँ मेरा अवश्य भला हो जाता

यह मेरा ही नहीं

जन-जन का ख़्वाब था

पर न जाने क्यों

सबका ही भाग्य खराब था

किसी की भी किस्मत नें साथ न निभाया

जब एक सुबह अचानक

तुम्हारी मौत का संदेशा आया

हम अपनी किस्मत को

कोसते ही रह गए

और तुम समंदर में समा गए

क्यों दे गए तुम धोखा ?

अपने चाहने वालो को

क्या करें तुम्हारे अपने

गोली बारूद के निवालों को ?

काश ! तुम ज़िंदा काबू जाते

तो शायद नफ़रत की आग

कभी न कभी तो बुझ जाती

तुम्हें देख तुम्हारे शिष्यों को

शायद कोइ शिक्षा मिल जाती

तुम्हारे साथ

न जाने कितने ही राज़

दफ़न हो गए तुम्हारे सीने में

जिनकी बदबू फ़ैली थी

आजीवन बहे तुम्हारे पसीने में

तुम ज़िंदा होते

तो शायद राज़ राज़ न रहते

तुम्हारी असमय म्रित्यु पर

स्वाल पे स्वाल न उठते

ऐसे स्वाल जिन पर

स्वाल तो उठते हैं

पर कोई जवाब नहीं आता

क्या था

तुम्हारा और नफ़रत का नाता

जिसकी आग में तुम

आजीवन जलते रहे

दूसरों को मारा

स्व्यं तिल तिल मरते रहे

काश ! तुम कभी उस आग से

बाहर निकल आते

तो दुनिया को खूबसूरत पाते

प्यार से रहते प्यार सिखाते

तुम मर नहीं अमर हो जाते

काश! लादेन तुम जिन्दा पकडे जाते…..

…………………………..

…………………………..?

07-04-2011

कौन कहता है जानवर कम हुए ..प्लीज़ सुझाव दें




जानवर -कुदरत का अनमोल रत्न और ऐसी सृजना जो किसी मानव के बस की बात ही नहीं
न जाने स्वार्थवश हम इन बेजुबान निर्दोष जानवरों को ही क्यों पशु की श्रेणी में रखते हैं जबकि ये तो किसी न किसी तरह मानव के काम ही आते हैं और तब तक हिंसक नहीं होते जब तक उन्हें हिंसक बनाया न जाए
ये कभी अपनी मर्यादाओं का हनन नहीं करते और सबसे बड़ी बात जो जन्मजात होते हैं वही भीतर/बाहर से होते भी हैं कोइ झूठा मुल्लमा ओढ़ कर नहीं चलते
दिखावे की दुनिया से बिलकुल अलग कितना स्वच्छ और सीधा-सादा जीवन जीते हैं ये जीव
शायद धरती की शोभा बढाने हेतु ही कुदरत नें इन जीवों का निर्माण किया होगा
कुदरत की बनाई तो हर चीज़ अनूठी ही है और हर संरचना के पीछे क्या गहरा राज़ छुपा है वह समझना तो सचमुच अंडा या मुर्गी पहले समझने वाले बात की तरह दुर्लभ है लेकिन मानव निजाद जिस प्रजाति का विकास तेज़ी से हो रहा है वह तो लगता है कुदरत के भी हर नियम क़ानून को पीछे छोड़ देगा और कभी मानव का उस ईश्वर रूपी अदृश्य शक्ति से सामना हुआ तो अवश्य ही मानव अपना सीना तान के कहेगा ” देखा मैं सर्वश्रेष्ठ रचनाकार हूँ , दम है तो बाहर निकल और मेरा सामना कर ” और उस समय लगता है ईश्वर भी हाथ जोड़ अपनी ही देN मानव के सामने गिडगिडा रहा होगा-” माफ़ करदो मुझे , तुम्हारे जैसी समझ और सोच के आगे मैं नतमस्तक हूँ और मैं अपनी हार स्वीकार करता हूँ ”




अपने आस-पास राह चलते आजकल अकसर ऐसी प्रजाति के जानवरो से सामना हो जाता है और हम उनकी मानसिकता को समझ ही नही पाते । न जाने क्यो लालच ने हमें इतना अन्धा बना दिया है कि हम हर मर्यादा , हर संस्कार , हर आदर को भूल जाते हैं । क्यों हमारे कोई सामाजिक मूल्य ही नहीं रह गए । अभी पिछले हफ़्ते की ही बात है कि हम वीकेण्ड में घूमने-फ़िरने के मूड में सुबह घर से निकले । पैट्रोल बंक पर लाईन में लगे हुए थे कि पीछे से आकर किसी नें इतनी जबर्दस्त टक्कर मारी कि हम लोग बाल-बाल बचे । खडी गाडी में ऐसे हुआ तो अगर चलती गाडी में ऐसा होता तो न जाने हमारी क्या हालत होती । बस गाडी से बाहर निकलते ही उसने क्षमा याचना की और रिपेयर का फ़ुल खर्च देने की बात कहकर हमें पुलिस में न जाने के लिए उसनें मना ही लिया । उसके साथ उसकी मां पत्नी और पांच-छ्ह साल का बेटा भी था । मुझे उसकी मां की शक्ल कुछ जानी पहचानी लगी । थोडा दिमाग पर जोर लगाया तो ध्यान आया कि वह मिसेज़ शान्ति मेरे बेटे के स्कूल ( एयरफ़ोर्स , ए.वी.कैम्प्स , बंगलोर )में प्राएमरी टीचर हैं । हालांकि वो मेरे बेटे को पढाती नहीं हैं और मैनें केवल उनको आते-जाते देखा ही है , फ़िर भी हमनें थोडा नर्म रुख अपनाया । गलती तो गल्ती है चाहे किसी से भी हो और अगर गल्ती हो गई है ( चाहे अनजाने में ही ) उसको मानना तो चाहिए ही । वह भी हमारे साथ सर्विस स्टेशन चलने के लिए तैयार हो गया और अपनी मां और बेटे को घर छोड पत्नी के साथ हमारे साथ गया । बातों बातों में पता चला कि उसकी पत्नी प्रसन्ना प्रकाश डी. पी.एस. ( दिल्ली पब्लिक स्कूल ईस्ट बंगलोर )में टीचर है और स्वयं ए.ओ.एल. कम्पनी में कार्यरत है । मतलब अच्छी खासी आमदन है । जब पता चला कि गाडी की रिपेयर में तकरीबन पंद्रह हज़ार तक का खर्च आएगा तो भी उसनें यही कहा कि आप गाडी ठीक करवाईये मैं खर्च दूंगा , कहकर वह वहां से खिसक लिया । हमें तो अपनी गाडी ठीक करवानी ही थी , सो तीन-चार दिन में गाडी ठीक हो घर आ गई । चूंकि हर गाडी का इन्शोरेंस रहती ही है तो हमें भी अपने पास से ज्यादा खर्च नहीं करने पडे लेकिन उसके लिए जो हम मानसिक तनाव में रहे और बीस किलोमीटर दूर जाने आने में जितना हम खराब हुए उसकी कोई कीमत नहीं है । हमारा पुलिस में न जाना हमारी सबसे बडी भूल थी या फ़िर बच्चे के स्कूल की टीचर को देखकर हमें उसे सम्मान देना ( जिसके काबिल वह नहीं थी ) बडी भूल थी , लेकिन हमनें जो किया अपनी तरफ़ से अच्छा किया और सोच भी लिया कि उससे खर्च अवश्य लेंगे और अपाहिज अनाथ बच्चों के लिए उसे खर्च कर देंगे । लेकिन उन बच्चों की किस्मत में ये नहीं था , उसनें खर्च देने से साफ़ मना कर दिया । यह तर्क देकर कि कानून के अनुसार हर गाडी का बीमा होता है । अब मैं सोचने पर मजबूर थी कि माना हर गाडी का बीमा होता है लेकिन तुम क्या जानवर हो कि कहीं भी किसी भी गाडी को जबरदस्ती टक्कर मारो और तुम्हारे लिए बीमा कम्पनी खर्च उठाएगी और कानूनन तुम्हें कोई सज़ा नहीं मिलेगी , क्योंकि तुम तो हो ही जानवर , जिसे सडकों पर आवारा घूमने की आज़ादी है । उससे भी बढकर मुझे निराशा हुई कि क्या कोई टीचर भी ऐसी हो सकती है ,वो भी डिफ़ेंस के रेपुटिड स्कूल की टीचर , जहां अनुशासन , सभ्याचार और मर्यादा का पाठ पढाया जाता है वो अपने बेटे को अच्छे संस्कार नहीं दे पाई TO वो इतने सारे बच्चों को क्या बनने के लिए ट्रेनिंग दे रही है ? कल को अगर मेरे बेटे की कक्षा में आएगी तो क्या सिखाएगी ?

क्या हम बच्चों को ऐसे हाथों में सौंप सकते हैं ?

क्या अनजाने में ही बच्चों को सामाजिक जानवर बनने की शिक्षा नहीं मिल रही है ?

दुख की बात है कि ऐसे सामाजिक जानव्र रक्तबीज की तरह दिन दौगुने रात चौगुने बढ ही रहे हैं । शायद कभी कोई चण्डी फ़िर से आए और कम से कम भारत भूमि को तो ऐसे सामाजिक जानवरों से बचा ले ।

मै अब भी चाहती हूं कि उसे उसकी गलती की सज़ा न सही बल्कि कुछ बच्चों की भलाई के लिए अपनी गलती का अहसास करना ही चाहिए । क्या आप मुझे सुझाव दे सकते हैं कि मुझे क्या करना चाहिए ऐसे घूमते फ़िरते आवारा सामाजिक जानवर के साथ ?

उसका पता और मोबाईल नम्बर है-



PRAKASH



House no. – 38



Munniakollala – Near last bus stop



MARATHALLI -post



BANGALORE- 560037



MOB. NO. – 9980655772



Gaadi no.- KA 03 MK 9217

15-08-2010

आजादी दिवस – नारी ताडन की अधिकारी और पुरुष ……….?

नमस्कार ,

आप सबको आजादी दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभ-कामनाएं | आजादी की चौन्सठवीं सालगिरह और सदी पूरी करने की तरफ तेज़ी से बढ़ते हमारे कदम | इन चौंसठ वर्षों में न जाने कितने उतार चढ़ाव आए होंगे और कुछ एक के तो भुक्त-भोगी हम भी हैं | जिस तरह हमारी सोच , हमारा रहन सहन , हमारे संस्कार , हमारी सभ्यता और यहाँ तक की रस्मों रिवाजों में भी विशालता आई है , उससे तो वास्तव में लगता है की हमारा देश दिन दुगुनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है और हमें गर्व है कि हम इस महान देश के नागरिक और भारत माँ की संतान हैं | एक युग बदल गया है लेकिन एक बात जिसे कहते हुए मुझे दुःख हो रहा है कि हमारी सोच आज भी उसमें संकीर्ण ही है | भाषण दिए जाते हैं , नारे बुलंद होते हैं , आवाज उठती है और जब वास्तविक रूप सामने आता है तो बदलाव के नाम पर होता कुछ भी नहीं , हंगामा अलग से खडा हो जाता है | इसमें नासमझ और कम पढ़े लिखे ही नहीं बल्कि पढ़े-लिखे लोगों की जमात भी शामिल है —-वो है नारी आज़ादी की बात | जिसे हमारा समाज आज भी अपना नहीं पाया है | बात सब करते हैं लेकिन सोच तो वही है कि —भगत सिंग जैसे वीर पैदा हों लेकिन पड़ोसी के घर में |
न जाने एक पंक्ति कविवर तुलसीदास जी की सब की जुबान पर कैसे घर कर गयी कि —-नारी ताडन की अधिकारी | भाव समझा नहीं बस शब्द हैं तो सच्चे तुलसी भक्त होने का सबूत तो देना ही है , ऐसा नहीं कि सबकी सोच एक जैसी है लेकिन अक्सर देखने को मिलता है कि ये सोच मध्यम वर्ग में ज्यादा देखने को मिलाती है | आज भी कुछ लोगों का मानना है कि नारी ताड़ना की ही अधिकारिणी है और अगर उसे समाज में रहना है तो उसे पुरुष द्वारा बनाए नियम -कानूनों का पालन करना ही होगा अगर नहीं करेगी तो जबरदस्ती करवाया जाएगा —–
क्यों , आखिर ये समाज के ठेकेदार क्यों भूल जाते हैं कि नारी भी इंसान है , उसकी भी सोच है , वह भी काबिलियत रखती है | क्यों आज भी कुछ लोग ये बात अपने गले से नहीं उतार पा रहे हैं कि नारी कोमल ही नहीं वीरांगना भी है और पुरुष की ताकत है | पुरुष और नारी जीवन रूपी गाडी के दो पहिए हैं , किसी एक के भी अभाव में दुसरे का कोइ मूल्य है ही नहीं , फिर क्यों पुरुषवादी समाज उसे पाँव की जूती बना कर रखना चाहता है | क्यों नहीं अपने अहम को मिटा नारी को बराबर का अधिकार दे सकता ?
भले ही नारी पर होने वाले जुल्मों के खिलाफ आवाज़ उठाई जाती रही है लेकिन सच्चाई ये है कि घरेलू हिंसा जिसमें अक्सर नारी प्रताड़ित होती है में कुछ भी फर्क नहीं पड़ता | इसके लिए जिम्मेदार कौन —-क्या नारी ? तो मैं कहूंगी हाँ बिलकुल नारी ही इस घरेलू हिंसा की जिम्मेदार है क्योंकि उसकी सोच विशाल है , असीमित सहनशीलता है , भावुकता है ….| हाँ यही कमियाँ हैं जो नारी को कमजोर बनाती हैं और यही उसकी ताकत भी है जिसके बल पर वह न जाने कितने जुल्म सह जाती है , अपने आंसू अन्दर ही पी जाती है और लम्बी आयु जी जाती है | क्या यही उसकी गलती है कि उसके अन्दर एक माँ की ममता है , एक कोमल ह्रदय है ? ये गुण तो नारी का गहना हैं , अगर यही गुण नारी में न होते तो न जाने दुनिया कैसी होती ? एक बात तो तय है कि दुनिया प्यार विहीन होती |
प्रश्न उठता है कि जब नारी पुरुष की ताकत है , नारी के बिना तो मानव जीवन का अस्तित्त्व ही संभव नहीं और नारी किसी पर तब तक जलम कर ही नहीं सकती जब तक उस पर कोइ जुल्म न हो | वह तो प्यार बाँट सकती है | खुद जल कर दूसरों का जीवन रौशन करती है , फिर भी उसे ताड़ना की अधिकारी ही क्यों माना जाता है | वह पुरुष ताड़ना का अधिकारी क्यों नहीं जो केवल अपने शारीरिक बल पर हृदयहीन होकर नारी पर जुल्म करता है ? क्या जो पुरुष करता है वह सब सही है ? क्या पुरुष के कुकृत्यों के लिए उसे ताड़ना नहीं चाहिए ?
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06-08-2010

जब पुरुष नें कहा तो कमाल हो गयी , नारी नें कहा तो वो छिनाल हो गयी..........?

बातों से निकली बात बात बेगानी हो गयी


दबी थी जो मस्तक में , अब कहानी हो गयी

अनभव को जीकर छोड़ दो

हर गम से नाता तोड़ दो

बोला जो एक शब्द भी

तो नादानी हो गयी

तुम सहती हो बस सहती रहो

कुछ कहना हो खुद से कहती रहो

कह दी जो मन की बात

तो बदजुबानी हो गयी

न पार करो अपनी सीमा

मुश्किल हो जाएगा जीना

लांघा जो एक कदम तो

इज्जत पानी हो गयी

नारी का घूंघट उतरा

तो धमाल हो गयी

कह दी जो मन की बात

तो वो छिनाल हो गयी

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जो कहना हो खुलकर बोलो

जब चाहे जहां भी जो खोलो

कह दी जो अपनी बात

तो सोच विशाल हो गयी

जब पुरुष नें कह दी बात

तो बात कमाल हो गयी ,

जब नारी उसी पे बोली

तो वो छिनाल हो गयी ..........



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06-07-2010

क्या करें क्या न करें , ये कैसी मुश्किल………..?

bahut बार ऐसे हालात हमारे सामने पैदा हो जाते हैं कि हम समझ ही नहीं पाते कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं । बातें बहुत छोटी-छोटी , पर इतनी गंभीर कि बडे-बडों को निरुत्तर करदें । जी हां , ऐसा ही वाक्या कुछ मेरे साथ भी हुआ और सोचने पर मजबूर हूं कि आज के हालात में हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं । हुआ कुछ यूं कि हमारे साहिबजादे ( जिसनें ३० जून को ही साढे चार साल पूरे किए है ) शुभम को कहानियां सुनना और सुनाना इतना पसंद है कि जब तक कोई कहानी नहीं सुन लेते तब तक न खाना , न होम-वर्क करना और न सोना मतलब हमें हर बार उन्हें कोई न कोई कहानी सुनाकर बात मनवानी पडती है और उसके बाद हम पर जो प्रश्नों की बौछार होती है , सच में उससे तो मुझे डर लगने लगा है । अब तो मेरे मुंह से गलती से भी कोई शब्द भी निकल गया तो उसके लिए मुझे बताना पडेगा कि यह शब्द मैनें क्यों बोला । क्यों हंसे , चुप क्यों हो , फ़ोन पर किससे बात की , पापा से क्या बोला , पापा नें क्या बोला , क्यों बोला , कहां जाना है , क्यों जाना है…………? ऐसे हजारों प्रश्न जिनका सामना मुझे आजकल करना पड रहा है 

                                                    मैं हर प्रश्न का जवाब (कोशिश करती हूं दे सकूं )ज्यादातर देती भी हूं । एक उदाहरण देखिए ….
१. बिल्ली चूहे क्यों खाती है , कुत्ता क्यों नहीं खाता ?
२. सूरज सुबह ही क्यों आता है रात को क्यों नहीं ?
३. सूरज में रोशनी क्यों है ?
४. गाय दूध क्यों देती है ?
 ५. हम खाना मुंह से क्यों खाते हैं ?
६. अगर चंदा मामा के साथ तारे न हों तो क्या होगा ?
७. पक्षी उडते क्यों हैं ? हम क्यों नहीं उड सकते ?
८. बिल्ली हमसे बात क्यों नहीं करती ?
 जी हां , ऐसे सैंकडों प्रश्न । ऐसा नहीं कि इन प्रश्नों के उत्तर नहीं है । हैं मगर हम अगर इतने छोटे से दिमाग में इतना ग्यान उडेलने लगें तो क्या उनका नन्हा सा मन पचा पाएगा । मैं जितना भी उसे संक्षिप्त में समझाने का प्रयास करती हूं उसकी जिग्यासा और बढती जाती है । खैर मैं बात कर रही थी कहानियों की कि जब तक हमारे नन्हे शैतान को कहानी सुना न दो और उसकी कहानी सुन न लो तब तक कोई काम आगे बढता ही नही । कहानी भी कोई ऐसी वैसी नहीं उसी टापिक पर कहानी सुनाओ जिसको सुनाने की फ़रमाईश की जाएगी । मतलब अच्छी-खासी परीक्षा होती है हमारी बुद्धि की ।आन-द-स्पोट हमें बताया जाता है कि इस विषय पर कहानी सुनाओ और हमें सोचने का समय भी नहीं दिया जाता । अब पाठकगण भले ही इस बात को समझें या न समझें लेकिन हमारे मित्र लेखकगण तो भली-भांति समझते हैं कि एक कविता/कहानी लिखने में कितने मक्खी-मच्छरों को मारना पडता है कि कहीं मन के किसी कोने में कोई भाव जग जाए और कलम चल ही पडे ।
                                                   बडों के लिए कुछ भी चलेगा क्योंकि आजकल उतना समय किसके पास है कि किसी और की रचना को मन लगाके पढो और फ़िर उस पर समीक्षा करो । हां टिप्पणी करनी पडती है , वर्ना आपको कोई पूछेगा ही नहीं । उसके लिए तो आसान सा तरीका है , बिना पढे तारीफ़ करदो । इसके तीन फ़ायदे हैं – एक तो आपको पढने में अपना समय बर्बाद नहीं करना पडता और दूसरा अगर तारीफ़ की जाए तो कोई बुरा भी नहीं मानता उर तीसरा यह कि आपकी रचना पर कम से कम एक टिप्पणी तो अवश्य मिल जाएगी । एक और आसान सा तरीका भी है वो यह कि सबकी टिप्पणियां पढलो और उसी के मुताबिक अपनी टिप्पणी भी चेप दो , तो काम आसानी से चल जाता है । किसने क्या लिखा , कितनी मेहनत से लिखा उससे क्या लेना-देना । अब हमारे बारे में तो कोई लिखने से रहा जो इसकी प्रवाह की जाए । लेकिन जब बात बच्चों के लिए लेखन की आती है तो भैया बहुत होशियार रहना पडता है । ये आजकल के बच्चे गलती पकडने में उस्ताद हैं ।पहले खुद बच्चा बनो , उनके मानसिक स्तर पर सोचो और फ़िर लिखो – बहुत टेढी खीर है बच्चों के लिए लिखना और आन-द-स्पोट जब मुझे कहानी सुनाने के लिए कहा जाता है तो मेरी हालत क्या होती होगी , समझने वालों को अवश्य मुझसे हमदर्दी होगी ।
                                     अब देखिए न कल ही शैतान बेटे को पढा रही थी – अ से अनार , आ से आम , इ से इमली , ई से ईख , उ से उल्लू…….। बाकी सब तो चला लेकिन उल्लू जी ने हमें ऐसा फ़ंसाया कि क्या बताएं बस उल्लू का नाम लिया और झट से फ़रमाईश आ गई – उल्लू की कहानी सुनाओ न । अब उल्लू को जानते तो हैं , बहुत बार खुद भी तो बनते हैं , अब कैसे बताती कि हम कब-कब कैसे कैसे उल्लू बन जाते हैं , कोई जान-बूझकर थोडे ही बनते हैं । कैसे बताती कि उल्लू बनना कितना आसान है और बनाना कितना मुश्किल । मुझमें तो इतनी समझ कहां है कि मैं किसी को उल्लू बना सकूं । तो उल्लू जी के बारे में क्या बताऊं सोच ही रही थी कि फ़िर से -मम्मी आप सोच क्या रहे हो , उल्लू की कहानी सुनाओ न । हमारे दिमाग की घण्टी बजी और हमें पहली बार अहसास हुआ कि हममें भी प्रेजेंस आफ़ माइंड नाम का कोई कीटाणु है , हमें डा. डंडा लखनवी जी की कविता याद आ गई
उल्लू जी स्कूल गए
बसता घर में भूल गए
मिस बुलबुल नें टेस्ट लिया
टेस्ट उन्होंनें नहीं दिया
सारे पक्षी हीरो थे
उल्लू जी ही ज़ीरो थे
बस हमनें उसी को कहानी बनाकर लम्बा खींचकर सुना दिया । आदत वश हम बींच-बीच में पक्षियों के जगह बच्चे शब्द का प्रयोग कर बैठे तो शैतान दिमाग नें वहीं पर हमें कितनी बार रोका बच्चे नहीं पक्षी और हम उल्लू की कहानी सुनाते-सुनाते कितनी बार रुके । अब यहां एक बार और थोडा रुकना पडेगा हमें – कहीं फ़िर से उल्लू न बन जाएं , पहले आप सब से पूछ ही लेते हैं कि मैनें डा. डंडा लखनवी जी की कविता को कहानी बनाकर सुनाया तो कोई चोरी तो नहीं की न , कल को पता चले मुझ पर की चोरी का मुकदमा ठोक दिया है और मैं अच्छी खासी उल्लू बन गई हूं । अगर यह चोरी है तो प्लीज़ मुझे जरूर बताएं ।
                                                     अभी तीन-चार दिन पहले न जाने हमें क्या सूझी कि बचपन से रटी-रटाई गुरु-शिष्य की कहानी एकलव्य की कहानी सुना बैठे । गलती तो हमारी ही है , शायद इतने छोटे बच्चे को हमें यह कहानी नहीं सुनानी चाहिए थी लेकिन हमारी बुद्धि में बात जरा देरी से ही समझ आती है । हमनें कहानी सुनाई , अब दोबारा आपको नहीं सुनाऊंगी , जानती हूं आप सब भी यह कहानी बचपन से सुनते आ रहे हैं तो अब तक तो सुन-सुनकर पक चुके होंगे । सो अपने प्रिय पाठकों ( जो थोडे-बहुत हैं , को न पकाते हुए)को बस वही बताऊंगी जो मेरे साथ हुआ । हां तो शुभम नें कहानी बडे ध्यान से सुनी और अंत में हमने हर बार की तरह फ़िर से जानना चाहा -कि कहानी कैसी लगी तो हमारी इच्छा के विपरीत जवाब मिला – बस छोटी से अच्छी लगी और बडी वाली गंदी । मेरी सारी मेहनत पर पानी फ़िर गया था । मुझे जानना था कि जो कहानी गुरु-शिष्य का नाता समझाने में दुनिया की सबसे बडी उदाहरण है और हमें दादा-दादी , मम्मी-पापा , अध्यापकगण सुना-सुनाकर समझाने का प्रयास करते थे और जिसे हम सुनकर ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेते थे , क्या मजाल कि आगे से कभी कोई प्रश्न करने की हिम्मत भी की हो ,उस कहानी को नन्हे से बच्चे नें सिरे से नकार दिया , बात मुझे कुछ हज़म नहीं हुई और कहानी पसंद न आने का कारण जानना अब मेरे लिए सबसे जरूरी था – जो जवाब मिला सुनकर मैं सोचने पर मजबूर थी |
 उसका जो जवाब था – गुरु नें उसे पढाया क्यों नहीं ?तो गुरु नें एकलव्य का अंगूठा क्यों मांगा , उसने गंदी बात क्यों की , एकलव्य को पेन हुआ होगा न । एकलव्य को भी अपना अंगूठा नहीं काटना चाहिए था न ।
संयोग से उसी दिन उसकी ड्राइंग क्लास भी थी और जब मैं उसे ले जा रही थी तो रास्ते में शुभम नें मुझसे बोला – आज मैं बस देखुंगा , कुछ करुंगा नहीं । क्यों तुम क्यों नहीं करोगे ? एकलव्य भी तो देखकर सीख गया था , तो मैं भी वैसे ही सीख लूंगा । अब मुझे अहसास हुआ कि बच्चे के दिमाग पर कोई भी बात कितना और कितनी जलदी असर करती है ।

मैं बस आप सब की राय में यह जानना चाहुंगी कि – क्या ऐसी कहानियां हमें आजकल के बच्चों को नहीं सुनानी चाहिएं । क्या मैने गलती की बच्चे को एकलव्य की कहानी सुनाकर । केवल एकलव्य की ही नहीं कितनी ऐसी कहानियां है जिससे नकारात्मक विचार पनपते हैं और आज के आधुनिक युग के बच्चे जब बडों से भी बढकर बडी बातें सोचते हैं तो क्या हमारी शिक्षा प्रणाली में उसी हिसाब से बदलाव नहीं होने चाहिएं । एक अहं प्रश्न क्या एक गुरु का अपने अनजान शिष्य से अंगूठा मांगना उचित था ? और क्या एकलव्य का यूं बिना सोचे-समझे अंगूठा काट कर दे देना क्या उचित था

19-06-2010

पापा तुम........?

पापा तुम क्या हो .....?


कभी-कभी सोचती हूं

कितनी सहनशीलता है तुमने

मैनें किसी भगवान को नहीं देखा

देखा तो सबसे महान को देखा

तुम्हें देख मैं सोच सकती हूं

भगवान कैसा होगा .......?

निश्चय ही तुमसे उन्नीस होगा

तुम्हीं मेरी प्रेरणा ,

तुम्हीं मेरा विश्वास हो

तुम्हीं मन की शक्ति ,

तुम्हीं एकमात्र आस हो ।

तुम्हीं निराशा में आशा का संचार हो

पापा तुम सच में खुशियों का संसार हो

भूल जाती हूं मैं हर गम

तुम्हारा प्यार पाकर

हर पीडा पी जाती हूं

तुम्हारा दुलार पाकर

दूर होकर भी तुम कितने पास

क्या मैं हूं इतनी खास

बिन बताए मेरा दर्द समझ जाते हो

तुम कैसे मेरे अंदर

गहराई में घुस जाते हो ?

सोचती हूं पापा

जो हर कोई तुम सा होता

तो कभी दुनिया में

फ़िर कोई जुल्म न होता

पापा तुम इतने सच्चे क्यों हो ?

इस बेईमान दुनिया में

इतने अच्छे क्यों हो ?

तुम कभी अपने लिए

क्यों नहीं जीते हो ?

क्यों मेरे हिस्से के

गम भी तुम्हीं पीते हो ?

मुझे गर्व है

जो मेरे पापा हो तुम

हालात की ठोकरों के

दिए जख्मों पर मरहम हो तुम

तुम ब्रह्मा , विष्णु महेश हो

पापा तुम सबसे विशेष हो

तुम विशाल आकाश हो

अंधेरे जीवन में प्रकाश हो

तुम्हीं मेरा आत्म-विश्वास हो

तन्हाई में भी तुम हर पल पास हो ।

पापा यूं ही रखना हमेशा

मेरे सर पर हाथ

मुझे चाहिए हर पल

तुम्हारा प्यारा साथ

मुझे हर पल चाहिए

तुम्हारा प्यारा साथ ।